स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--मुक्तक
शीर्षक--'आधा तीतर आधा बटेर'
जीवन में समस्या का ढेर ।
आते रहे हैं देरसबेर ।।
जीते रहे ऐसे ही लोग ।
आधा तीतर आधा बटेर ।।१।।
रुपये का चक्कर लिया घेर ।
गरीब हो अथवा धनकुबेर ।।
उठाते जीवन में नुकसान ।
आधा तीतर आधा बटेर ।।२।।
कोई समझता खुद को शेर ।
कनक-कनक का लगाता फेर ।।
इनके घात से रहे अनजान ।
आधा तीतर आधा बटेर ।।३।।
गायों को ग्वाल देता टेर ।
चराता उन्हें वन है घनेर ।।
तीर गह व्याध है नदी तीर ।
आधा तीतर आधा बटेर ।।४।।
चहे खैर एक खाये खैर ।
ठीक नहीं रहा करना बैर ।।
हृदय द्वार खोल 'ठाकुर' ढूँढ़ ।
आधा तीतर आधा बटेर ।।५।।
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व्याख्या--इन मुक्तकों में मानव प्रवृत्ति के कुछ बातों
पर प्रकाश डालने का प्रयास किया गया
है । क्र.-३,४और ५ में क्रमशः कनक का
अर्थ धतूरा , सोना , तीर का अर्थ बाण ,
किनारा तथा खैर का अर्थ भलाई , पान में
खाने का खैर है । यमक अलंकार है ।
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