जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-मौन भूधर
विधा-मुक्त छंद (सन्देह अलंकार)
कांकेर के हृदय स्थल पर
मूक पाषाण बना भूधर
निहारता दुग्ध धवल
सलिल के आप्लावित
प्रवाह में अपना चेहरा।
सहस्र पेड़ों की छाया कभी
तपिश का अहसास होने
नहीं देती भूधर को।
तेज बारिश से उठता
धूंध छुपा देता भूधर को।
आश्चर्य कहां गये दुरुह
राह में अचल भूधर
कौन गायब कर दिया
शहर की शान को।
धूंध में छुपे पहाड़ का
लुका-छिपी का खेल
बहुत भाता बच्चों को।
सोन ई-रुपई तालाब को
निहारते मन भ्रमित होता
हर बार कि पानी
चांदी- सा रुपहला है
या सोने -सा सुनहरा।
भूधर के अप्रतिम सौंदर्य पर
चार चांद लगाते सूरज
दादा अकसर छुप जाते
पहाड़ी के पीछे
सूर्यास्त के पहले ही
, गोधूलि बेला के भ्रम में
दिन में चरवाहा हांक
ले आता गायों को।
भूधर सूखते नदी में ढूंढ़ता हैं
अपना प्रतिबिंब, प्रदूषण की
कालिख से स्याह कालिमा
देखकर भी मौन
भूधर पलकें बंद कर
कल्पना कर लेता है
अपने प्रतिबिंब निहारने का।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर, छग
व्याख्या-इस कविता में पहाड़ के सौन्दर्य का वर्णन है, बारिश के दिनों में धूंध उठने पर संदेह होता है यह धरोहर कहां गायब हो गया। सोन ई-रुपई तालाब का पानी कभी रुपहला कभी सुनहरा दिखाई देता है, संदेह पैदा होता है पानी वास्तव में चांदी जैसा सफेद है या फिर सोने जैसा सुनहरा।
सूरज के पहाड़ी के पीछे चले जाते ही शाम होने का चरवाहे को भ्रम हो जाता है।
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