Wednesday, June 3, 2020

छत्तीसगढ़ के कांकेर से नलिनी बाजपेयी की रचना- अहंकार

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
  जिला-कांकेर
विषय-अहंकार वीभत्स   रस युक्त
शीर्षक -अहंकार
 
          *अहंकार*
समर क्षेत्र में लिए 
      अहंकार मानव था खड़ा,
दूर से चील,कौए मानव
         को देख रहे रुधिर सना।

शत्रु दल के संहार से 
        रक्त रंजित पड़ा,
अंग भंग देख चील 
      आँख कान खाने अड़ा।

सुंदर काया घिनौनी लागे
       कौओं को आनंद आने लगा,
लाशों से बदबू  है आने लगा।

देख दशा जीवन की 
       मन में जुगुप्सा भरती जाएं
अहंकार से भरा युद्ध 
       घृणित भाव भरती जाएं।

निंदनीय कर्म न करो 
 ‌‌      जीवन की रुचि घटने लगे,
शव की गति देख मन 
        घृणा से भरने लगे।

हाड़-मांस,विष्ठा, 
      रुधिर से बनी यह काया,
जीते जी अहंकार से 
     भरी होती जग की माया।
____________________

व्याख्या-उपरोक्त कविता में मानव जीते जी अहंकार से प्रेरित होकर युद्ध करता है और मृत्यु को प्राप्त होता है।उसके बाद उसके मृत्यु शरीर को छील कौए खाते है।यह दृश्य घृणा करने वाला होता है।

नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर, (छ. ग.)

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