*रचनाकार--एच-एस-अरमो "अरमान "
*निवास--रायपुर (छत्तीसगढ़)
*जिला--रायपुर ।
*शीर्षक--वीर बलिदानी ।
*विधा--मुक्त छंद ।
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"वीर बलिदानी "
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खूब लड़े थे ,
अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ ,
छत्तीसगढिया की भूख मिटाने,
लूटा था अनाज सरकारी गोदामों से ।
सोनाखान की धरती में,
हुआ था पैदा ऐसा लाल ,
नाम था उसका--वीर नारायण सिंह,
था बहुत खुँखार और उतना ही जाँबाज ।
आत्म-स्वाभिमानी और
था वो सच्चा देशभक्त ,
उन्हें 10दिसम्बर,सन् 1857 को ,
अंग्रेजों ने बीच चौराहे में,दे दी थी फाँसी ।
कहते हैं खूब,लोग भला ,
पर,वीर बलिदानी तो,
कभी मरा नहीं करते,
ना ही वो गुमनाम हुआ करते --?
रहते सदा वे ,इतिहास में,यादगार बन के ।
सुलगा दी थी उन्होंने,
स्वतंत्रता की दहकती चिन्गारी,
अपने कारनामों से ही हुये थे,
कट्टर -विरोधी आंदोलन के,
साहसिक अमर बलिदानी ।
आदिवासियों के बीच,थे वे,
एक जुझारु ऐतिहासिक शक्तिशाली सेनानी ,
उनके इस नी:स्वार्थ बलिदान को,
आओ हम सब मिलकर,
प्रण लें-कभी ना,भूला पायेगें,
उनकी अनूठी शहादत को ।।
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व्याख्या:--इस रचना में छत्तीसगढ़ के सोनाखान के माटी पुत्र की अनूठी शहादत को आपके सामने लाने का प्रयास किया है ।उनके उत्सर्ग की छोटी सी बानगी रखते हुए,उस साहसिक सेनानी को तहे-दिल से सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ ।
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