रचनाकार- गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विधा- छंद मुक्त
शीर्षक- "मन की आवाज"
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कुछ जख्मों का कोई मरहम नहीं होता,
हर आंसू का कतरा शबनम नहीं होता।
स्वार्थ के बाजार में सब बिकते हैं,
पर कोई जालिम इश्क सा बेरहम नहीं होता।।
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दिल के रिश्ते तोड़ना आसान नहीं होता,
आखिर गड़े मुर्दे में कोई जान नहीं होता ।
मोहब्बत में करने वाले बहुत मिलेंगे,
पर हर कोई राधा-कृष्ण जैसा महान नहीं होता ।।
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मुफ्त में मिल जाए वह कोई आन नहीं होता,
और हर जनाजे के नसीब में श्मशान नहीं होता ।
इश्क से जले भुने दिखे हैं कई मकान,
पर मेरे आंगन सा कोई दीवावसान नहीं होता ।।
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मंजिल के ठोकरों सा कोई अपमान नहीं होता,
प्यार में तिरस्कार जैसा कोई अपादान नहीं होता ।
तन्हा ही सोना होगा दो गज जमीन में,
सुना है कब्र सा कोई सुनसान नहीं होता ।।
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मन-मनन जैसा युद्ध घमासान नहीं होता,
मां के शब्दों सा कोई अभय दान नहीं होता ।
राह के अड़चनों से घबराना नहीं,
क्योंकि पिता के मस्तक सा कोई ऐश्वर्यवान नहीं होता ।।
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आशिकों के लिए कोई आयुर्विज्ञान नहीं होता,
दिल देने जैसा कोई अंग दान नहीं होता ।
चाहत के चाहने वालों चाहते रहो,
प्रेम निभाना पड़ता है यह किसी से प्रदान नहीं होता ।
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वक्त सा कोई मेजबान नहीं होता,
और नसीब सा कोई व्यवधान नहीं होता ।
आवश्यक नहीं कि हर जमीन उपजाऊ हो,
प्यासा इंसान सा कोई रेगिस्तान नहीं होता ।।
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गुलशन खम्हारी"प्रद्युम्न"
बेहतरीन, अति सुन्दर रचना😊👌👌
ReplyDeleteLajawab 👌👌
ReplyDeletekoi sabd nhi👌👌
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