जिला :- महासमुंद
विधा :- छंद मुक्त कविता
अलंकार :- यमक अलंकार
शीर्षक :- बारिश और प्रेम
घुमड़ - घुमड़ घन आते हैं,
मोती खूब बरसाते हैं।
संतृप्त कर हृदय को,
खुशियां घन कर जाते हैं।
पर फैलाए मोर खड़ा है,
मेघ की राह निहारे है।
पर मेघ की बात न पूछो,
बस बरसे यमुना किनारे है।
अबकी सावन ओ बरखा रानी,
सोम की बरसा कर जाना।
हर सोम मन में मेरे,
भक्ति भाव भर जाना।
मैं कान्हा यमुना के तीर में,
बंशी लेकर आऊंगा।
जो चलाए नैनों के तीर तुम,
मैं घायल हो जाऊंगा।
घायल उर में वो राधा रानी,
नेह की बरसा कर जाना।
जब सावन घुमड़ कर आए,
सखियों संग तुम आ जाना।
व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने सावन की बारिश में प्रकृति की सुंदरता और प्रेम भाव को बड़ी सुन्दरता से शब्दबद्ध करने का प्रयास किया है जिसमें कविता की शोभा बढ़ाने के लिए यमक अलंकार से अलंकरण किया है जिसमें शब्दों की पुनरावृत्ति हुई है साथ ही उनके अर्थ भी भिन्न-भिन्न हैं जैसे -
घन - बादल
घन - तिगुना
पर - पंख
पर - परन्तु
सोम - पानी
सोम - सोमवार
तीर - किनारा
तीर - बाण।
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