स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--दोहा छन्द
शीर्षक--'जगदीश रथयात्रा'
सारे जगत के स्वामी , विश्वपति जगन्नाथ !
तेरी कृपा से प्रभुजी , करना हमें सनाथ ।।१।।
परब्रह्म सृष्टिकर्ता ! तेरी शक्ति अपार ।
हे विश्व पालक तेरी ! महिमा अपरम्पार ।।२।।
बलभद्र आप सुभद्रा , तीनों मूरत साथ ।
तीनों के श्रीचरण में , सदा झुकाऊँ माथ ।।३।।
अपनी मौसी गेह तक , करने को प्रस्थान ।
गुण्डिचा तक जाने को , निकले दयानिधान ।।४।।
मात्र एक झलक पाने , जुटती भीड़ अपार ।
दर्शनार्थी दर्शनकर , करते जयजयकार ।।५।।
होती सजावट रथ की , खूब नयनाभिराम ।
ध्वज-पताका फहराते , नवीन वस्त्र तमाम ।।६।।
रथपर बैठ प्रभु निकले , भक्त के मन उमंग ।
लोग अनेक नाच रहे , लेकर झाँझ-मृदंग ।।७।।
घुँघरू बाँध पैरों में , दिखाते ताल -माल ।
संचार में संचारी , करते खूब कमाल ।।८।।
मनोहारी होता है , उनका सारा भाव ।
उनके कथन में होता , ज्ञान का भी प्रभाव ।।९।।
देखके रथपर प्रभु को , अनेक भक्त अनन्य ।
पुलकित मन होते रहे , मानें खुद को धन्य ।।१०।।
नर - नारी दरश करने , आते वृद्ध - जवान ।
बच्चों की भीड़ भारी , पहिने नव परिधान ।।११।।
मिष्ठान्न खा खरीदते , खिलौने बहु प्रकार ।
देते 'ठाकुर' पर्व सब , खुशी- प्रेम-संस्कार ।।१२।।
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व्याख्या--जगदीश जगन्नाथ स्वामीजी के महिमा की
वर्णन एवं रथयात्रा का चित्रण ।
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