जिला -रायगढ़ छत्तीसगढ़
विधा -कविता
शीर्षक -"जगन्नाथ महिमा "
जगन्नाथ महिमा
हे !जगन्नाथ पुरी के जगन्नाथ ,
हम करते हैं तुझे प्रणाम।
जड़ संसार में तू ऊर्जा स्वरूप,
चैतन्या संसार में तू है ज्ञान।
तू निराकारा सर्वत्र व्याप्त ,
ना तेरा आदि ना तेरा अंत ।
तू पारदर्शी, तू पारगामी ,
व्यापक सत्ता तू अंतर्यामी ।
तेरी महिमा अपरंपार ,
करते हैं वंदन बार-बार।
तेरी महिमा जो पहचाने,
व्यवहार स्वरूप में उसे अपनाएं।
तेरी शक्ति का सदुपयोग कर,
जीवन में हर पल करें उपकार ।
हर पल जीवन में रहे खुश ,
कभी ना आए जीवन में दुःख।
हे!जगन्नाथ तुझे प्रणाम ,
हम करते हैं वंदन बार-बार।
व्याख्या- इस कविता में महाप्रभु जगन्नाथ जी की महिमा का वर्णन किया गया है ।वह सर्वत्र विद्यमान है और चैतन्य अर्थात आत्मा में ज्ञान स्वरूप में विद्यमान है ,जो इस ज्ञान की महिमा को जान लेता है ।वह अपने जीवन में सदुपयोग कर, उपकार कार्य करता है ।वह मनुष्य जीवन में सुखी रहता है उसे कभी दुःख की साया नहीं सताती है।
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