Monday, June 29, 2020

महासमुंद से विनोद कुमार "जोगी" की रचना- जीवन के पड़ाव

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विधा :- छंद मुक्त कविता
अलंकार :- यमक अलंकार
शीर्षक :- जीवन के पड़ाव।

जीवन ज्यों है सागर,
उठते गिरते ज्वार - भाटा,
है व्यवसाय यह अद्भुत इसमें,
कभी मुनाफा, कभी है घाटा।
पल में छाए दुख की घटा,
कभी उर से है दुख घटा,
कर के बल पर काज कर,
जीवन‌ बिखेरती नव छटा।
जीवन में जो पंक मिले,
पंकज को ना भाता है
पंकज पंक में खिल जाता,
देख पंकज मुस्काता है।
कभी बिखरती सूरज किरणें,
नव उल्लास जगाती है,
कभी चुभती उर में किरणें,
नव दिन भी ना सुहाती है।
जीवन है नद का बहता पानी,
अभिशाप ठहराव है,
ना रुकना थक हार कर जोगी,
जीवन में कई पड़ाव है।








व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने जीवन के उतार चढ़ाव को अपने शब्दों में पिरोने का प्रयास किया है, जिसमें वे कहते हैं कि जीवन में कोई भी चीज लंबे समय के लिए नहीं होती। बदलाव ही जीवन है।
कवि ने काव्य के अलंकरण के लिए यमक अलंकार का प्रयोग किया है यथा :- घटा - मेघ
घटा - कम होना
कर - हाथ
कर - किसी कार्य को करना
पंकज - एक नाम
पंकज - कमल का फूल
नव - नया
नव - नौ ( एक संख्या )
अलंकार के इस सुंदर प्रयोग से काव्य के आकर्षण में चार चांद लग गए हैं।

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