जिला----- जांजगीर-चांपा(छत्तीसगढ़)
विधा-----संस्मरण
शीर्षक---- बोतल्दा पहाड़
व्याख्या---- यह सन् 2007की बात है मैं उस समय शासकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय स्टेशन पारा सक्ती विकास खण्ड सक्ती वर्तमान में शैक्षणिक जिला-सक्ती, जिला जांजगीर-चांपा के अन्तर्गत आता है कार्यरत था । एक दिन हम सभी मध्यान्ह अवकाश में पूरे स्टाफ के साथ बैठे हुए थे बहुत से बच्चे स्टाफ रुम में आ गए और एक साथ कहने लगे सर हम लोग कही घूमने के लिए जाना चाहते हैं दो तीन विद्यालयों का नाम भी गिनाए वहां के सभी सर और बच्चे घुमकर आ गए हैं हम लोग भी जाना चाहते हैं ।पहले तो बच्चों को समझाया गया । कहां पढ़ाई-लिखाई को छोड़कर घुमने जाओगे अपनी पढ़ाई को देखो बच्चे लोग कहने लगे पढ़ाई-लिखाई तो हो ही रही है।
नहीं मानने पर उनको समझाते हुए कहा गया कि इसके संबंध में परसों बैठक रखते हैं फिर निर्णय लिया जायेगा । बच्चों के चले जाने के बाद हम लोग आपस में चर्चा किए । किसमें जाएंगे, कितना खर्च आएगा नाश्ता भोजन सबके बारे में मीनू सहित निर्णय लिए। बैठक हुआ जाने के लिए सबकी सहमति बन गयी बैठक में सबसे नजदीक स्थान बोतल्दा पहाड़ के पास ।
रविवार के दिन जाने का निर्णय लिया गया ,साथ ही विकास खण्ड शिक्षा अधिकारी कार्यालय में इसकी सूचना एवं अनुमति प्राप्त करने की बात कही गई छात्र छात्राओं से कहा गया कि अपने माता-पिता या पालक से बोतल्दा जाने के लिए एक अनापत्ति प्रमाण पत्र जाने के पूर्व कार्यालय में जमा करेंगे जिनका जमा हो जायेगा वही हमारे साथ बोतल्दा जा पायेगा ।
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बच्चों को अनापत्ति प्रमाण पत्र का नमूना भी लिखकर दिया गया । प्रमाणित किया जाता है कि मैं अपने पुत्र या पुत्री खाली स्थान कक्षा खाली स्थान आपके विद्यालय शासकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय स्टेशन पारा में पढ़ रहा/ रही है बच्चों के द्वारा शिक्षकों के साथ बोतल्दा पहाड़ जा रहा/रही है किसी प्रकार की अप्रिय घटना हो जाने पर विद्यालय एवं शिक्षक दोषी नहीं होगे इसकी जिम्मेदार मैं रहूंगा/रहूगी । नीचे में पिता या पालक के हस्ताक्षर ।
रविवार के दिन विद्यालय में प्रात:आठ बजे सभी उपस्थित हो गये मेरे दो बच्चे कुमारी वीणा और कुमारी सत्या भी साथ में गये थे दिसंबर का महीना था जाने के लिए दो मिनी बस किराए में लिया गया था।नाश्ता भोजन और आवश्यक सामग्री को रखवाया गया । फिर जल्दी रवाना हो गये । कुछ शिक्षक अपने साधन मोटर साइकिल से भी गए ।लगभग एक घंटे पश्चात बोतल्दा पहाड़ के पास पहुंच गए । पहुंचते ही वहां सबके द्वारा नाश्ता किया गया नाश्ते में मिच्चर ,बिस्कुट, समोसा एक -एक रसगुल्ला दिया गया ।
भोजन बनाने के लिए लकड़ी खरीदें, भोजन बनाने वाले को भोजन कितने समय और कैसे बनाना है समझाते हुए कहा गया कि भोजन स्वादिष्ट बनाना चाहिए जैसे हम लोग घर में खाते हैं बच्चे बात को सुन रहे थे सब हंस पड़े ।
अब हम लोग पहाड़ उपर चढ़ रहे हैं हमारे आते तक भोजन बनकर तैयार रहना चाहिए । आएंगे खायेंगे फिर तुरंत विद्यालय के लिए रवाना होना है ।
फिर हम सब धीरे धीरे पहाड़ की ओर चढ़ने लगे चढ़ते-चढ़ते बहुत ऊपर चले गए। रास्ता भूल गए उस समय मोबाईल का प्रचलन आज की तरह नहीं था । नीचे से हम लोगों को गांव वाले देख रहे थे और आपस में चर्चा कर रहे थे ये लोग रास्ता भूल गये हैं ।उधर जंगली जानवरों का डर बना रहता है कभी भी भालू निकल सकता है ।
उपर में जाकर हम सब परेशान । बड़े बड़े पत्थर पेड़ पौधे ,झाड़ी सब शिक्षक बच्चे परेशान रास्ता भूलने के कारण न हम ऊपर जा पा रहे थे न नीचे आ पा रहे थे और नहीं घूम पा रहे थे ।
फिर सब निर्णय लिये की ठण्ड का मौसम है । जल्दी सूर्य डूब जाता है नीचे उतरने में भी समय लगेगा खाना खाने के विद्यालय भी समय रहते पहुंचना है ।
फिर नीचे की ओर देखते देखते धीरे-धीरे उतरे जिसको आधा घंटा में उतरा जा सकता है करीब डेढ़ घंटे में उतरे ।सबकी खोज बीन हुई ।
सूची के अनुसार सबका मिलान किया गया कुछ देर आराम करने के बाद सब खाना खाए फिर शाम होते होते विद्यालय पहुंच गए ।
पालक भी इंतजार कर रहे थे देखते ही सबके मन में प्रसन्नता छा गई और सब अपने अपने घर चले गए।
आज मुझे लिखते हुए बड़ा हर्ष हो रहा है और दुख भी ।दुख इस बात का है कि दो हमारे शिक्षक साथी ,श्री लखेश्वर प्रसाद देवांगन जी एवं श्री गणेश राम पटेल जी इस दुनियां में नहीं है ।
कभी कभी हम लोग बोतल्दा पहाड़ केबारे में चर्चा करते हैं और हंसते भी है जिन शिक्षकों के साथ मैंने अध्यापन कार्य किया उनमेंआदरणीय श्री ए.आर.राठौर प्रधान पाठक,श्री लेख राम पटेल ,श्री टीके लाल नेताम एवं कमल सिंह सिदार है ।
बोतल्दा पहाड़ का नाम याद आते ही आज भी मन आनंदित हो जाता है ।
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