पता - ग्राम-आमगांव(तमनार),
जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विधा - वीर रस
शीर्षक- "आवाहन"
डम-डम-डम डमरू का डंका बाजे,
चम-चम-चम चमक से कैलाश साजे ।
चपल चपला भय से भयभीत हो रही,
फिर त्रिशूल शिवा संग भूतेष बिराजे ।।
निज रज कण से बनी थी मनुष्यता,
अब सही न जाए बाल की यह बाल धृष्टता ।
सुदर्शन नहीं शंकर का त्रिशूल चलेगा,
करुं आवाहन बंद हो तुम्हारी निकृष्टता ।।
रंग भंग संग संसर्ग की लोलुपता लाई,
जंग में भुज-भुजबल से अकर्मण्यता लाई ।
शौर्य-सम्मान-साहस का धरोहर दिया था,
क्यों इसमें भी भीरुता की अपररूपता लाई ।।
धू-धू कर जल रही धरा केवल दर्प अभिमानों से,
मानव मानव न रहा,मग्न नग्न है गुमानों से ।
पतित-पतित वह अतीत हो रहा,
भर गया झोली ओछे अपमानों से ।।
श्वांस भरो ऐसा जैसे कोई हुंकार हो,
हो इंद्रियदमन कि झनकती कोई झनकार हो ।
क्रोध गरल सरल सबको मिलते नहीं यहां,
फन उठाओ जैसे स्वयं शेष की फुंकार हो ।।
अब न अबला की कोई चित्कार हो,
ना असहाय का कोई दुस्सह दुत्कार हो ।
तुममें ही बसे हैं राम रावण,
पहचान लो तो हर वक्त हर दम ही संस्कार हो ।।
आदर सम्मान स्नेह का नित पालन हो,
कर्म करो तो समय का समय में संचालन हो ।
गर्क हो गया है पूरा परिवेश यहां,
अब तो नवपालन नवोदित धरा का प्रक्षालन हो ।।
गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
व्याख्या-
शिव व पार्वती जी को कैलाश में मानव की दुर्दशा देखकर एक आवाहन का सुझाव दिया जा रहा है, उनकी संतान इतने निकृष्ट नहीं हो सकती ।
Behtarin rachna hai
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