Monday, June 1, 2020

छत्तीसगढ़ के महासमुन्द से विनोद कुमार जोगी की रचना- अर्जुन

रचनाकार:- विनोद कुमार जोगी
जिला:- महासमुंद
विधा :- कविता
रस :- वीर रस

अर्जुन की यहीं कहानी।

बना समर का माहौल राज्य में,
संकट सर मंडराने लगा,
भयभीत हुआ विराटराज,
सुकुमार मन से घबराने लगा।
देख मुहाने, कौरव सेना,
विराट सुकुमार रणभूमि गए,
वृहन्नला बने धनुर्जय,
रथ हांकते साथ गए।
देख पितामह, द्रोणाचार्य को,
गला सुकुमार का सूख गया,
विकराल रूप देख सेना का,
रथ के पीछे छुप गया।
देख समय की मांग को अर्जुन,
निकाल धनु वह ललकारा,
युद्ध सकल अब मैं लडुगां,
तुम रथ चलाओ कह पुकार।
ज्यों ही पार्थ ने निज धनु पर,
प्रत्यंचा खींच चढ़ाया,
पलक झपकते कौरव दल में,
खलबली उसने मचाया।
एक वार से मुर्छित हो गया,
सूरवीरों का दल,
ना तब कुछ काम आया,
शस्त्र ना कोई भुजबल।
हुंकार भरते आए जो दुर्योधन,
बस हाथ मलते रह गए,
ऐसे हुई बाणों की वर्षा,
सब सूरवीर संभलते रह गए।
कर्ण, कृपाचार्य, अश्वथामा,
परास्त हुए पानी - पानी,
एक के आगे घुटने टेकी सकल सेना,
अर्जुन की यहीं कहानी।

व्याख्या:- उपरोक्त रचना में रचनाकार ने अज्ञातवास में अर्जुन के द्वारा लड़े गए एकतरफा युद्ध का वर्णन करते हुए कहा है कि किस प्रकार अकेले अर्जुन ने पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, दुर्योधन, दुशासन, कृपाचार्य, कर्ण, आदि से सजे कौरव सेना को परास्त कर दिया।

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