स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता
शीर्षक--'दीवार के भी होते कान'
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सोच-समझ के भाई मेरे , खोलें अपनी जुबान ।
इस जगती के भीतर होते , दीवार के भी कान ।।
चुगली करना पातक भारी , बढ़ाया करे खटास ,
जो बोलें आगे ही बोलें , वाणी में भर मिठास ।
कर्णप्रिय है रहे हमेशा , लगे पीयूष समान ।।
इस जगती के भीतर होते , दीवार के भी कान ।।१
वाणी सहज नहीं होती है , महत्वपूर्ण है बोल ,
बात को है मन में तौल के , पीछे फिर उसे खोल ।
मत करें बेकार की बातें , शब्द हैं ब्रह्म समान ।।
इस जगती के भीतर होते , दीवार के भी कान ।।२
बिना विचारे कभी न बोलें , करें विचार सौ बार ,
ऐसी बोल बोलिए प्यारे , जो न जाये बेकार ।
सुननेवाले खुश हो जाएँ , ओंठ में हो मुस्कान ।।
इस जगती के भीतर होते , दीवार के भी कान ।।३
बात से है हाथी पाइये , बात से हाथी पाँव ,
हथियारों से भी बात सदा , करती है बड़ा घाव ।
दिलपर है सुननेवालों के , वाणी चलातीं बान ।।
इस जगती के भीतर होते , दीवार के भी कान ।।४
बात के ही कारण से हुआ , महाभारत संग्राम ,
अट्ठारह अक्षौहिणी सेना , हताहत हुए तमाम ।
एक बोल के कारण ही तो , मचा घोर घमासान ।।
इस जगती के भीतर होते , दीवार के भी कान ।।५
औषधि जैसी मीठी बोली , हरती हृदय का पीर ,
कटुक बोल पीड़ा पहुँचाये , साले समस्त शरीर ।
कड़वे बोल'ठाकुर'न बोलें , रखना हमेशा ध्यान ।।
इस जगती के भीतर होते , दीवार के भी कान ।।६
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व्यख्या--'दीवार के भी होते कान' मुहावरा के माध्यम
से चुगलखोरी तथा मीठी-कड़वी वाणी के
प्रभाव बारे में प्रकाश डालना ।
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