Tuesday, June 16, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर'बंजारीवाले' की रचना- दीवार के कान

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता
शीर्षक--'दीवार के भी होते कान'
                        ०××××××०
सोच-समझ  के  भाई  मेरे , खोलें अपनी जुबान ।
इस जगती के  भीतर होते , दीवार  के  भी  कान ।।
चुगली करना पातक भारी , बढ़ाया  करे  खटास ,
जो   बोलें  आगे  ही  बोलें , वाणी में भर मिठास ।
कर्णप्रिय   है   रहे   हमेशा , लगे   पीयूष  समान ।।
इस जगती के  भीतर होते , दीवार  के  भी  कान ।।१
वाणी सहज  नहीं होती  है , महत्वपूर्ण   है  बोल ,
बात को है मन में तौल  के , पीछे फिर उसे खोल ।
मत  करें  बेकार  की  बातें , शब्द हैं  ब्रह्म समान ।।
इस जगती के  भीतर होते , दीवार  के  भी  कान ।।२
बिना विचारे कभी न बोलें , करें  विचार  सौ बार ,
ऐसी   बोल  बोलिए  प्यारे , जो  न  जाये  बेकार ।
सुननेवाले  खुश  हो  जाएँ , ओंठ में  हो  मुस्कान ।।  
इस जगती के  भीतर होते , दीवार  के  भी  कान ।।३
बात  से   है   हाथी  पाइये , बात  से  हाथी  पाँव ,
हथियारों से भी  बात सदा , करती है  बड़ा  घाव ।
दिलपर  है  सुननेवालों के , वाणी  चलातीं   बान ।।
इस जगती के  भीतर होते , दीवार  के  भी  कान ।।४
बात के ही कारण से हुआ , महाभारत     संग्राम ,
अट्ठारह  अक्षौहिणी  सेना , हताहत   हुए  तमाम ।
एक बोल के कारण ही तो , मचा  घोर  घमासान ।।
इस जगती के  भीतर होते , दीवार  के  भी  कान ।।५
औषधि जैसी  मीठी बोली , हरती  हृदय का पीर ,
कटुक बोल पीड़ा पहुँचाये , साले  समस्त  शरीर ।
कड़वे बोल'ठाकुर'न बोलें , रखना  हमेशा  ध्यान ।।
इस जगती के  भीतर होते , दीवार  के  भी  कान ।।६
                         ०××××××××०
व्यख्या--'दीवार के भी होते कान' मुहावरा के माध्यम
             से चुगलखोरी तथा मीठी-कड़वी वाणी के 
             प्रभाव बारे में प्रकाश डालना ।

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