जिला-कांकेर, छग
शीर्षक-बाबू जी अब मत पीना
विधा-कविता ( मुक्त छंद)
बाबूजी अब मत पीना,
शराब, बीड़ी,हुक्का,
अपने नाती- पोते
के खातिर।
जब बच्चों से मंगवाते हो
नशा की ये पोटली,
बच्चे इसे बहुत शान
की वस्तु समझते हैं।
आप तो वटवृक्ष हो,
घर-आंगन के,
आपके खांसते ही
कान चौकन्ने हो
जाते हैं दादी,ताई
मां और चाची के।
आदर्श हो घर के
मैं तो छोटी-सी
शाखा हूं आपके
आंगन की,
जिसे रोप दिया
आपने शहर से
कोशों दूर।
मन के आंखों से
देखती हूं
संस्कार के उन
जड़ों को,डरती हूं
कमजोर न हो
जायें नन्हीं कोपलें।
पानी *के न मिलने पर
वंचित न हो जाएं
आकाश कुसुम बनने से
सिर्फ इसीलिए बाबूजी
अब मत पीना,
शराब,बीड़ी,हुक्का।।
*बेटी*
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर,छग
*संस्कार
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