जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
शीर्षक-"तुम ही तुम हो"
विधा-छंद मुक्त
व्याख्या- यहां प्रेमी का प्रेमिका के प्रति प्रेम को प्रेममय परिकल्पना का वर्णन है ।
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रूप में धूप में स्नेह के स्वरूप में
कली कोरक या महकते पुहुप में
आह में चाह में या प्रेम की कराह में
तुम ही तुम हो समंदर इक अथाह में
सुबह से शाम में राधा के श्याम में
किसी प्यासे को प्यासा घाम में
तुम ही तुम हो आठों प्रहर आठों याम में
तुम ही हो मेरे सुबह-शाम में
रंग में तरंग में उद्विग्न उमंग में
हर पल हर वक्त लड़ रहे जंग में
तुम ही तुम हो मेरे अंग-अंग में
भेजी चिट्ठी या प्रेम पत्र पयाम में
अधर हैं प्यासी छलकते जाम में
तुम ही लिखी हो प्रेम पयाम में
तुम मेरी मान तुम ही सम्मान हो
स्वास प्रश्वांस में बसी तुम मेरी जान हो
कैसे कहूं रग रग में बसी तुम महान हो
तुम ही मेरी प्रेम का परिणाम हो
तुम ही मेरी वजूद तुम ही अंजाम हो
जहां से लड़ जाऊं तुम ही सरेआम हो
गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
सुंदर
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