जिला:- रायगढ़ ,छत्तीसगढ़
विषय:- छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक विरासत
शिर्षक:- हमर संस्कृति
*हमर संस्कृति*
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छत्तीसगढ़ महतारी मोरे, परौ तोरे पैईया।
हमर संस्कृति सुघर सबले बढ़िया।।
झरना झर झर बहे,अरपा नदिया के धार।
इंद्रावती हर कहे, महानदी ला जुहार।
बस्तर जंगल म चहके चिरइया।
हमर संस्कृति सुघर सबले बढ़िया।।
मैना फुदके अपार, सरई पेड़ के डार ।
पहार पकगे केंदू ,फरगे डोंगरी मा चार।
अम्मट बांसी के हमन ख़्वाईया।
हमर संस्कृति सुघर सबले बढ़िया।
तिहार सांझे बिहान,फुकड़ी गेड़ी के खेली।
मड़ाई मेला हर भावे,नुआखाई हरेली ।
सुआ करमा चंदैनी पंथी के नचईया।
हमर संस्कृति सुघर सबले बढ़िया ।।
सोहे ठेठरी सोहारी,खुरमी,अरसा के रोटी।
पपची पर्रा मिठाथे,गुझिया गुलगुला के गोटी।
ताड़ी कोसना के हावे पिवईया।
हमर संस्कृति सुघर सबले बढ़िया।।
पंडवानी भोजली के गीत,सुधर डोमकच के बाजा।
गौरा गौरी जगे, राजा भरथरी के नाचा ।
सरहुल राउत के बोली गाये ददरिया।
हमर संस्कृति सुघर सबले बढ़िया।।
देवता धामी झुपे नरवा तरिया के तीर ।
जंगल झाड़ी बसे हमर धरती के वीर।
बइगा हावे जमो के पूजइया।
हमर संस्कृति सुघर सबले बढ़िया।।
भोरमदेव खड़े महामाया के छाया।
हावे बम्बलेश्वरी के दया,प्रगट दंतेश्वरी के माया।
चंद्रसेनी हावे सबके बचइया।
हमर संस्कृति सुघर सबले बढ़िया।।
जमो गियाँ मितान घूमे संगी संगी संगवारी।
सोझवा सिधवा अबड़,नई जाने कोनो लबारी।
हावे बोली गुतुर छतीसगढ़ीया।
हमर संस्कृति सुघर सबले बढ़िया।।
मौलिक रचना
अजय पटनायक
vry vry nice
ReplyDeleteNice
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