राज्य : महाराष्ट्र
कविता का शीर्षक : लडाई
हम पेड़ के वो पत्ते नहीं ।
जो आसानी से झड़ जाएंगे।
हम तो हवाओं को ।
चीरने वाले पत्ते है ।
जो वक़्त आने पर।
हम तूफान से भी लड़ जाएंगे।
ऐसे ही नहीं हम झड़ जाएंगे।
हमे हवाओं से लडने का हुनर आता है।
हमे हवाओं का दव पेज आता है।
हमने बरसात के पानी के नीचे।
हवाओं दबते देखा है।
हमने उसी बरसात के पानी मे
खुद को निखरते देखा है।
हमने गरमी के धूप में ।
हवाओं को थकते देखा है।
उसी धूप में ।
हमने खुद को निखरते देखा है।
हमे हवाओं से जीत छीनना आता है।
बस थोड़ी समय लड़कर मुस्कुराना आता है।
हम के वो पत्ते नहीं ।
जो आसानी से झड़ जाएंगे।
रिशु पांडेय
नाशिक,
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