बाड़मेर राजस्थान
8104123345
श्रम की देवी
करीब से देखा है मैंने ,
वो पत्थर-पहाड़ों को ,
अनवरत तोड़ रही है ।
बस ! जीने की आस मे ही,
पसीने की बूंद-बूंद से ,
बिखरा जीवन जोड़ रही है ।।
मुन्ना कुदरत के ‘झूले’ में ,
मुन्नी थोर की छांव में ,
बेखबर हो खेल रही है ।
पर मां की ममता का मोह ,
एक नजर बच्चों पर है तो ,
दूसरी पत्थर झेल रही है ।।
एक नजर देखा मैने कि,
वो पत्थर दर पत्थर को ऐसे,
धुन मस्ती में तोड़ रही है ।
बस ! जीने की आस मे ही,
पसीने की बूंद-बूंद से ,
बिखरा जीवन जोड़ रही है ।।
खामोशी और झुकी नजर में ,
लगे डूबी अगर-मगर में ,
जीवन है अब तिहरे दशक में ।
कितना नीरस, कितना पावन,
और उपर से विधवा जीवन ,
है हर एक नजर की शक में ।।
दिन में फैली निशा की चादर,
दूर हटाने को वो पल-पल ,
यौवन को झकझोर रही है ।
बस ! जीने की आस मे ही,
पसीने की बूंद-बूंद से ,
बिखरा जीवन जोड़ रही है ।।
दुरह साधना में लीन है ,
यौवन की इन गालियों में वो ,
बेबस होकर भूल चुकी जो ।
झलक पड़ी जब उसको मेरी ,
शर्म की बिजली कौंध गई फिर ,
श्रम की देवी बीच रूकी जो ।।
यौवन की फुलवारी कैसी ,
सुख की वो तरकारी कैसी
खुशिया गम की भोर रही है ।
बस ! जीने की आस मे ही,
पसीने की बूंद-बूंद से ,
बिखरा जीवन जोड़ रही है ।।
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