रचनाकार - *गुलशन खम्हारी*
जिला -- तमनार,रायगढ़(छ.ग.)
शीर्षक - " *प्रकृति से प्यार*"
विधा -- मानवीकरण अलंकार
*व्याख्या*:
प्रकृति को किसी प्रेमिका के रूप में प्रदर्शित करने का एक प्रयास किया गया है । प्रकृति के विभिन्न प्रारूपों में प्रेमिका को एक प्रेमी किस तरह से ढूंढता है क्या देखता है यह उसके लेखनी के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है ।
*मौलिक रचना*
श्यामल-श्यामल,कोमल-कोमल रंग है सुंदर अरु सुंदर है वो रुप ।
नवपल्लवित-नवअंकुरित-नव बीज को लगे ज्यौं सुंदर धूप ।।
कनक-कांति-काया उनकी बरसाए द्युति दिवस अनुरूप ।
स्वयं-सुदर्शना-सौंदर्य का दिखे अद्भुत अप्रतिम सा स्वरूप ।।
निश्चल-निकुंज-निहार रहा लेकर लतिका,कोरक अरु पुहुप ।
अधर इधर-उधर सकुचाए ज्यों हर्षित पुष्प में मंडराता कोई मधूप ।।
प्यास से शुष्क ग्रीवा चाहे मरू मरीचिका में लबालब भरा कूप ।
अंतः सुप्त अवस्था लगे स्वयं प्रीत प्रत्यक्ष कोई प्रतिरूप ।।
हर किसी की चाह में आज मांग है चाहे कुरूप या हो कोई विद्रूप ।
प्रेम-पनाह-पाए, प्रकृति का हुस्न दिखा है प्यार समरूप ।।
गुलशन_खम्हारी
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ReplyDeleteवाह वाह 👌👌 बहुत ही बढ़िया
ReplyDeleteबहुत खुबसुरत ❤❤👌👌 खम्हारी जी👍
Mind blowing
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