रचनाकार -- प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला -- राजनांदगाँव (छ.ग.)
विधा --- दोहा
शीर्षक --" मानुष जीवन साज "
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।।१।।
सरग नरक मन त्याग के ,
सकल सफल कर काज ।
सकल करम फल है यहीं ,
मानुष जीवन साज ।।
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।।२।।
द्वेष दंभ छल त्याग के,
सत्य पंथ चल आज ।
राह यही है जीत का ,
सहज सरल है राज ।।
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।।३।।
नित्य जीव निज है जिया,
कृत्य करे है पाप ।
पर हित को निज है हिया ,
सफल जीव है आप ।।
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।।४।।
सुख दुख दो तट है नदी ,
मध्य बहे जल धार ।
सत्य निष्ठ पतवार से ,
भव तर जाएं पार ।।
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।।५।।
विटप समहि कर नेक तू ,
सर्व करो बलिदान ।
प्राण वार कर देखना ,
बढ़ता कैसे मान ।।
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।।६।।
नैतिकता कर थामना ,
दोष दर्प पर वार ।
व्यथा विपत कर सामना ,
सत्य वचन ना हार ।।
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।।७।।
दीन हीन पर हो दया ,
करो स्त्री का मान ।
स्वर्ग धरा बन जायगा ,
रहे सदा ये भान ।।
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।।८।।
तरुवर से जल जीवना ,
जल बिनु जीवन सून ।
कुसुमित हो घर आंगना ,
उपवन वन में फूल ।।
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।।९।।
पंगु करो उपहास ना ,
ना ताना कृशकाय ।
सबसे हो सम भावना ,
सबके मन को भाय ।।
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।।१०।।
रूप मन का हो आइना ,
जैसे होते संत ।
दर्प करें किस बात का ,
सबका होए अंत ।।
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रचनाकार ✍🏻
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प्रवीण कुमार ठाकुर
मोबाइल नं -९६१७४४०२६८
पतोरा ,राजनांदगांव (छ.ग.) ।
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व्याख्या :---
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प्रस्तुत दोहा के माध्यम से मैंने जीवन के वास्तविक मूल्यों की संक्षेप में व्याख्या करने का अदना सा प्रयास किया है । साथ ही यदि मानव अपने स्वार्थ को त्याग दे तो हमारी यही धरा स्वर्ग तुल्य हो सकती है । अपनी करनी का फल हमको यहीं मिलना है ।।
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