जिला :- महासमुन्द
विधा :- दोह छंद
शीर्षक :- जीवन
जीवन है तो है मरण, परम सत्य ये जान।
नाशवान काया भया, मत कर मनुज गुमान।।१।।
ऊँच नीच तो आत है, जीवन की यह रीत।
द्वेष भाव को त्याग दे, रख ले मन में मीत।।२।।
चार दिवस की चाँदनी, फिर अंधेरी रात।
बीती बातें भूल जा, रात गई सो बात ।।३।।
जीवन की यहीं रीत है, पल - पल है बदलाव।
नदियाँ सा बहता रहे, मत कर तू ठहराव।।४।।
गर हो मन में हौंसला, ऊँची होत उड़ान।
सफल जगत में होत वो, बढ़ता उसका मान।। ५।।
व्याख्या :- उपरोक्त रचना में रचनाकार ने बड़े ही सुन्दर ढ़ग से जीवन मूल्यों को छंद बद्ध करते हुए कहा है कि अगर यह जीवन हमें मिला है तो उसके साथ ही मृत्यु भी निश्चित है, साथ ही मानव काया नाशवान है। कवि कहते हैं की सुख - दुख जीवन से जुड़ा हुआ है, अतः हमें बैर भाव ना रखकर प्रेम भाव से रहना चाहिए। जीवन में कोई भी बात अनिश्चित काल तक नहीं टिकती अतः हमें बुरे दौर को भुला देना चाहिए। जीवन बदलाव की ही दूसरा नाम है अतः जीवन में बदलाव आवश्यक है। साथ ही अगर जीवन के इस उड़ान को हौंसले से उड़ा जाए तभी सफलता मिलती है और जग में नाम बढ़ता है।
Osm
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