रचना कार का नाम -वासुदेव साव "वृन्द"
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जिले का नाम - महासमुन्द (छ.ग.)
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शीर्षक - प्रकृति बना उपवन
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विधा - मुक्त छंद
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रचना -
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प्रकृति की गंध ,
सांसों में भरी ,
हर मन हर तन,
प्रकृति बना उपवन।
हरित रुप मन को भाया,
जन जन में प्रेम आया ।
नव परिवर्तन नव अभिजीवन।।
प्रकृति बना उपवन ।।
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क्षण क्षण पल पल ,
धरती की हरियाली ,
रुप बडी़ निराली ,
स्वर्णमयी घाटी में,
गंध भर रही है ,
मनोरम ध्वनि विखेर रही है।
गीत गाते आया सावन ।।
प्रकृति बना उपवन ।।
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नव संकल्पों का नया दौर ,
आम्र कुंजों पर आया बौर ,
वसुंधरा के अधरों पर ,
मकरंद की परिभाषा ,
छाया मन में अभिलाषा ,
है पुलकित जग प्यारा ,
सुमन सुरभित है मन तुम्हारा ,
नित्य नव चेहरों पर सजी ,
शहनाई की मीठी धुन बजी ,
मन्द मन्द मुस्कान ।
प्रकृति बना उपवन ।।
प्रकृति बना उपवन ।।
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व्याख्या -
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आज धरती पर प्रकृति की मनोरम छटा उपवन बन कर प्रत्येक जन मानस के स्वांस रुप नया जीवन प्रदान करते सबके दिलों में मनोहर ध्वनि बिखेर रही है ।धरती हरित साडी़ पहन कर स्वर्णमयी गोद में लोरी गीत गाते शहनाई की मीठी धुन से सुखद प्यार दे रही है ,जिससे सम्पूर्ण जगत में नये आभा लिये मुस्कान की लहर व्याप्त है ।इससे खुश होकर आम के वृक्षों पर बौर आने लगे हैं ।सावन अपनी मनोरम छटा से धरा पर जल बिखेर रही है।फूलों से सजी हुई प्रकृति की गोद सबके मन को हर्षित कर रही है ।यही भाव प्रकृति जन मानस में एक नया परिवर्तन तथा नये मुस्कान देकर परिभाषित कर रही है ।
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