राज्य- छत्तीसगढ़, जिला- कोरिया
शीर्षक- "मैं मजदूर"
मो. 7049391780
---------------------------------------------
हे ऊपर वाले! बता दे तू क्या है मेरा चारा,
मैं मजदूर, हर जगह मेरा नसीब हारा ।
नाम गिनाउं भला, मैं किस-किस का,
रेल की पटरी तक ने, मुझको मारा ।।
मेरी दुर्दशा की कहानी, सदियों पुरानी,
मेरी आंखों में सपनों की जगह, हमेशा पानी ।
हो वक्त यदि किसी के पास, आय मेरे नजदीक,
कुछ और नहीं मुझको,अपनी पीड़ा सुनानी ।।
चलायमान बनाया संसार मैंने, खून पसीना गार,
युगों-युगों से मेरे हिस्से, फिर क्यों घृणा, दुत्कार ।
कितने आयोग, कितने संगठन, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय,
मिल न सका फिर भी मुझको, मेरा मानव अधिकार।।
इस जगत के विकास में,मैंने जुड़े नित नए अध्याय,
मेरे साथ फिर भी सदा, पक्षपात और अन्याय ।
रहा हूं सदा हाशिए पर, घिरा हूं अंधेरों से,
देर से ही सही, कोई मुझे भी रोशनी दिखाए ।।
रुक जाएगी गति संसार की, जिस दिन दूंगा कंधा डाल,
हो जाएगी धरती बंजर, पड़ जाएगा अकाल ।
रख सकते हो तो रखो, मेरे प्रति संवेदनशीलता,
जग वालों! देखो आने लगा है, मेरे भी रक्त में उबाल ।।
बिजेन्द्र अहीर
बहुत ही सुन्दर कविता। हमेशा की तरह मर्मस्पर्शी, जो वास्तव में एक कविता न हो कर समाज को आइना दिखाती है। महोदय आपने वाकई अद्भुत रचना की है।
ReplyDeleteअच्छा विषय एवं अच्छी और प्रासंगिक रचना विजेंद्र जी
ReplyDelete