जिला-राजनांदगांव छत्तीसगढ़
छंदमुक्त कविता
विरह,, मिलन की आस
प्रिया प्रियतम की विरह में तपती!
प्रियतमा प्रिय यादों की छवि निहारती!!
सब सुध -बुध भूल बन चकवी!
प्रियतम की विरह में राह निहारती!!
नयन निशदिन अश्क भर रोती!
बालम से मिलन आस बांधती!!
राह के कांटे चुन-चुन विरहनी!
रूत मिलन राह फूलों से संवारती!!
आने वाले हैं विरहन स्वामी!
सज-सज प्रिया रूप संवारती!!
मन आस लिए विरह क्षण- क्षण बिताती!
नयन नीरभर खुशियों से इठलाती!!
व्याख्या-
रचनाकार ने इस कविता में विरह वेदना को प्रस्तुत किया है। जिसमें एक विरहनी अपने प्रीतम से विरह होने पर पुनः उनसे मिलने की आस में उनका राह निहारती है। और अपने आंखों में आंसू भरकर उसे मिलन की आस बांधे रहती है ।और उनके आने की बात सुनकर वह अपना रूप सजाकर संवारती है ।और अपने आंखों में खुशियों के आंसू भरकर स्वयं इठलाती है।
पदमा साहू खैरागढ़ जिला राजनांदगांव छत्तीसगढ़
वाह वाह वाह बढ़िया रचना
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