Wednesday, May 27, 2020

उत्तराखण्ड से सुलोचना परमार "उत्तरांचली" की रचना- अखबार के दो पन्ने

नाम - सुलोचना परमार "उत्तरांचली"
पता- देहरादून उत्तराखण्ड
शीर्षक-- दो पन्ने अखबार के
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       *दो पन्ने अखबार के*
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आँखें गेट पर लगीं रहती
गुजरते न क्षण इन्तजार के।
चाय की चुस्की संग मजे हैं देते
 *दो पन्ने अखबार के* ।



देश दुनियां की खबर संग
स्थानीय खबर हम पढ़ते हैं।
लगता है इंसान कहीं कहीँ
अब कुत्तों जैसे लड़ते हैं।

कितनी जल्दी खबर पहुंचाते
*दो पन्ने अखबार के* ।



मजदूरों के हाल छपे हैं
कैसे हैं बेहाल छपे हैं।
कुछ मरकर चले गये हैं
कुछ मरने को तैयार खड़े हैं।


कैसी कैसी खबर हैं लाते
*दो पन्ने अखबार के*


कोरोना का ख़ौफ खड़ा है
गली ,मुहल्ले ,चौराहों पर।
मुंह पर बांधो मास्क और
दूर दूर खड़े हो दुकान पर।


हाथ जोड़ कर करो नमस्ते, कहते
*दो पन्ने अखबार के*

कितने पोजेटिव, कितने नेगेटिव
 ये तो रोज  बताते  हैं।
कितने मर गए क्वारंटिन में
ये खबर भी लाते हैं।


अपनी रक्षा स्वयं करो बताते
*दो पन्ने अखबार के*


कहीँ  जान के लाले पड़े हैं
कहीँ मालामाल हैं हो रहे।
गरीबों के राशन पानी पर
हाथ साफ हैं हो रहे ।


कहां कहां से खबर  हैं लाते

*दो पन्ने अखबार के*


मंदिर -मस्जिद, गुरूद्वारे सब
सभी जगह अब बन्द पड़े हैं।
जीवित भगवान के रूप में
कोरोना योद्धा हुए खड़े हैं।


मान करो सब इनका कहते
*दो पन्ने अखबार के*



खबरें पढ़कर कभी कभी
आँखों में आंसू आते हैं।
करते हैं कोई नेक काम तो
गर्व उन पर कर जाते हैं।


सभी खबर हम तक पहुंचाते
*दो पन्ने अखबार के*


 देश दुनियां की खबर हैं लाते
 बिछुड़ों को भी मिलवाते देते ।
कभी रुलायें कभी हंसाएं 
सच बात भी ये कह जाते ।

कैसे कैसे रंग दिखाते
*दो पन्ने अखबार के*


सुबह सुबह स्वागत करते सब
 हर खबर को चाट हैं जाते ।
शाम ढले तक कोने पड़ा है 
और फिर रद्दी हैं हो जाते ।


 बच्चों की पतंग बन जाते
*दो पन्ने अखबार के*


 इंसान का भी जीवन ऐसा
ना जाने कब क्या हो जाये।
कभी बसन्त बहार है यारों
 कभी सावन भादों हो जाये ।

 वो भी बन जाते है एक दिन
 *दो पन्ने अखबार के*


सुलोचना परमार "उत्तरांचली"
देहरादून

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