पता- देहरादून उत्तराखण्ड
शीर्षक-- दो पन्ने अखबार के
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*दो पन्ने अखबार के*
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आँखें गेट पर लगीं रहती
गुजरते न क्षण इन्तजार के।
चाय की चुस्की संग मजे हैं देते
*दो पन्ने अखबार के* ।
देश दुनियां की खबर संग
स्थानीय खबर हम पढ़ते हैं।
लगता है इंसान कहीं कहीँ
अब कुत्तों जैसे लड़ते हैं।
कितनी जल्दी खबर पहुंचाते
*दो पन्ने अखबार के* ।
मजदूरों के हाल छपे हैं
कैसे हैं बेहाल छपे हैं।
कुछ मरकर चले गये हैं
कुछ मरने को तैयार खड़े हैं।
कैसी कैसी खबर हैं लाते
*दो पन्ने अखबार के*
कोरोना का ख़ौफ खड़ा है
गली ,मुहल्ले ,चौराहों पर।
मुंह पर बांधो मास्क और
दूर दूर खड़े हो दुकान पर।
हाथ जोड़ कर करो नमस्ते, कहते
*दो पन्ने अखबार के*
कितने पोजेटिव, कितने नेगेटिव
ये तो रोज बताते हैं।
कितने मर गए क्वारंटिन में
ये खबर भी लाते हैं।
अपनी रक्षा स्वयं करो बताते
*दो पन्ने अखबार के*
कहीँ जान के लाले पड़े हैं
कहीँ मालामाल हैं हो रहे।
गरीबों के राशन पानी पर
हाथ साफ हैं हो रहे ।
कहां कहां से खबर हैं लाते
*दो पन्ने अखबार के*
मंदिर -मस्जिद, गुरूद्वारे सब
सभी जगह अब बन्द पड़े हैं।
जीवित भगवान के रूप में
कोरोना योद्धा हुए खड़े हैं।
मान करो सब इनका कहते
*दो पन्ने अखबार के*
खबरें पढ़कर कभी कभी
आँखों में आंसू आते हैं।
करते हैं कोई नेक काम तो
गर्व उन पर कर जाते हैं।
सभी खबर हम तक पहुंचाते
*दो पन्ने अखबार के*
देश दुनियां की खबर हैं लाते
बिछुड़ों को भी मिलवाते देते ।
कभी रुलायें कभी हंसाएं
सच बात भी ये कह जाते ।
कैसे कैसे रंग दिखाते
*दो पन्ने अखबार के*
सुबह सुबह स्वागत करते सब
हर खबर को चाट हैं जाते ।
शाम ढले तक कोने पड़ा है
और फिर रद्दी हैं हो जाते ।
बच्चों की पतंग बन जाते
*दो पन्ने अखबार के*
इंसान का भी जीवन ऐसा
ना जाने कब क्या हो जाये।
कभी बसन्त बहार है यारों
कभी सावन भादों हो जाये ।
वो भी बन जाते है एक दिन
*दो पन्ने अखबार के*
सुलोचना परमार "उत्तरांचली"
देहरादून
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