शीर्षक - कारवां मजदूरों का
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निकल पडा है कारवां मजदूरों का
अपनो की तलाश में
मन मै हौसला लिए
हिम्मत ना हारने की कसम खाई है
बढे बुढे महिला बच्चे
भूखे प्यासे नंगे पैर पैदल ही
भरी दोपहरी में उम्मीद लिए।
कि अपने घर जायेगे
तो अपने लोग तो मिलेगे
मर भी जायेगे तो अपनो का कांधे
दफन होने के लिए अपनी जमीन
अपनी धरती की माटी तो मिलेगी
यहा पराया देश रमेश कोई अपना नही
रोजी रोटी कमाने के लिए आये थे।
इसी बार धोखा खा जायेगे पता नही था
कोरोना आयेगा लाक डाउन हो जायेगा
काम बंद मजदूरी बंद तो रोजी रोटी बंद
मजदूर और मालिक का रिश्ता सिर्फ एक समझौता है
मजदूर काम करके देता है और मालिक पैसा
उससे ज्यादा कुछ नहीं।
यहा पराया देश मे अपना कहलाने वाला कोई नही
अपना परेशान अपना दुख किसे बताये
कोई सुनने वाला नही
अपने गांव जायेगे अपने लोग मिलेगे
इस आशय से मजदूरों ग़ामीणो का कारवा
अपनो की तलाश मे
अपनी घर की ओर चल पडा है
रचना कार
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