जिले का नाम:- मुंगेली(छत्तीसगढ़)
शीर्षक:- जर बुखार
विधा:- हास्य
जर बुखार
हत रे बैरी जर बुखार,
कोन डहर ले आगे रे।
चारो मुड़ा घुम फिर के,
मोरे ऊप्पर झपागे र।।
आनी बानी खावँव मैं ह,
सुग्घर नींद भर सोवँव रे।
साले कती बर ले आगे तैं,
मने मन म रोवँव रे।।
डेंगु मलेरिया कोनजनी,
साले आनी बानी नाव तोर।
वाह रे जर बुखार तैं,
डाँवा डोल कर दे मोर।।
मोर पकड़ के होते त,
तोला मैं बतातेव रे।
अइसन मारतेव साले,
नंगत ले ठठातेव रे।।
थारी भर खवइया मनखे,
पानी घलो नई पियावत हे।
थोरकन तैं खाले बेटा,
दाई ददा जोजियावत हे।।
कतेक दिन ले रइबे तैं,
अब तो इँहा ले जाना जी।
मोला तैं ह छोड़ भइया,
आऊ कोखरो म समाना जी।।
नागेश कश्यप।।
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व्याख्या-
ये रचना जर बुखार के ऊप्पर हास्य विधा म आधारित हे, जेमा एक मनखे जऊन ह जर बुखार म परे हे ओहा कोसत हे के, हत रे मोर बैरी दुश्मन जर बुखार कहाँ कहाँ तँय ह कती बर ले आके मोरे ऊप्पर झपा गे हस, तोर सेती मोर रंग रंग के खवाई पियाई घलो छूट गे हे निंद भर घलो नई सो पावत हँव, ये प्रकार ले जर बुखार ल कोसत ये रचना के जम्मो पंक्ति के भाव स्पष्टीकरण हे.।
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