जिला-कांकेर
शीर्षक-पर्यावरण संरक्षण
विधा-छंद मुक्त
*पर्यावरण संरक्षण*
प्रकृति करे पुकार,
सुन लो मेरे लाल,
पर्यावरण बचा लो
मुझे करो निहाल।
हरा-भरा था आँचल
नदियां बहती थी निर्बाध,
जीर्ण-शीर्ण कर दिया तुमने
अब कैसे रहोगे खुशहाल।
मेरे अस्तित्व पर दांव लगा,
तूने उठाया अब सवाल दर सवाल।
कंक्रीट मय शहर हुआ बिगड़ा परिवेश जीना हुआ मुहाल।
जल और वन जीवन हैं
मन में लाओ ये ख्याल,
संभल जाओ अब रखो ना
मन में मलाल।
पर्यावरण प्रदूषण
विनाश का प्रतीक,
है जीवन का सर्वनाश
ये बात है सटीक।
ना कलकल बहती धारा होगी
ना कलरव की आस,
पंख-पखेरू मर जाएंगे
बादल भी करेंगे निराश।
ना हरियाली ना जीवजन्तु,
होगा इंद्रधनुष बिन खाली आकाश।
गिरि का पिघलना,सूरज का ताप नहीं रहा जीवन की आश।
आओ नव संकल्प ले जल-वन
संरक्षित कर सजाएं संसार,
सबका भविष्य बचाएं
जग को बनाएं सौंदर्य-आगार।
आओ हरा भरा धरा करे
वन उपवन लेने लगा नव आकार,
स्वर्ण किरणों के संग
सूर्य-चन्द्र सा स्वप्न करे साकार।
आओ पर्यावरण बचाएं
धरती को स्वर्ग बनाएं,
प्रकृति की जर्जर काया
फिर से हरा-भरा कर जाएं।
प्रकृति करे पुकार,
सुन लो मेरे लाल,
पर्यावरण बचाओ
मुझे करो निहाल।
व्याख्या-पर्यावरण प्रदूषण के लिए प्रकृति का मनुष्यों से गुहार करते हुए कहती है कि मुझे प्रदूषण मुक्त मुझे निहाल करो।बिना हरियाली के जीव-जंतु का अस्तित्व मिट जाएगा।पृथ्वी को प्रदूषण मुक्त कर धरा स्वच्छ बनाएं।जग को सौंदर्य युक्त बनाएं।
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नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर( छ. ग.)
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