स्थान - सारंगढ़
जिला -रायगढ़, छत्तीसगढ
विधा -कविता
शीर्षक -मजदूर
----"मजदुर"------
मै मजबूर मजदूर हूँ
अपने हालतों से मशहुर हूँ
दो जून की रोटी के लिए
छोड़ दिया मैने आशियाना
घर खेत है मेरी गिरवी पड़ी
ऊपर से ये आफत आ पड़ी
मिलों दूर है मुझसे मेरा आशियाना
जाने के लिए नहीं है मोटर कार
दर-दर सड़क पे भटक रहा हूँ
मैला कुचैला चिथड़े कपड़े
बिन जूते के नंगे पाँव भटक रहा हूँ
मिल जाये कही भोजन तो कर लूँ
करूँ तो क्या करूँ कुछ समझ ना पाऊँ
समझ ना पा रहा हूँ मैं ये कैसा फसाना
लौट कर मुझको है जाना आशियाना
बाट जोह रहे है मेरा परिवार आशियाना
घर पे मेरे बुढ़ी माँ बाबा है हलाकान
घर परिवार पे मेरे हो रहे सब हलाकान
कैसे भी कर के आ जाये मेरा बच्चा
कैसें भी कर के गाँव को मै पहुँच जाऊँ
गाँव पहुँच कर बुढ़ी माँ बाबा को गले लगा हूँ।
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