रचनाकार -- प्रवीण कुमार ठाकुर
जिला -- राजनांदगाँव (छ.ग.)
विधा -- कविता ( हास्य रस)
शीर्षक -- "मंधु के अंतस के
पीरा" ।
...........................................
होगे रे लाकडाउन ,
आगे रे कोरोना ।
भट्ठी ह खुलत नई हे ,
परगे रे रोना ।।
अंतस के पीरा ल ,
का मैं हर कहंव ।
बिन पीये शराब मैं ,
जीये नई सकंव ।।
जेन मजा पियई म ,
घर कुरिया म नई हे ।
पियई मोर काम बुता ,
अउ कुछु बुता नई हे।।
खिसियाथे बड़ घर म सब ,
थोरकन मुँहू रीता नई हे ।
घर म भड़कथे दाई बाई हर ,
तोर बर काम बुता नई हे।।
पी ले बस दु घुँट ताहन ,
फेर होस कहाँ अब हे ।
लहुट के मैं जवाब देवंव ,
तन म मोर रोस कहाँ हे ।।
राखंव मैं गोड़ ल कहाँ ,
पांव माड़त कते कर हे ।
रेंगंथों मैं विहि रद्दा म ,
जेन रद्दा म दारु भट्ठी हे ।।
गिर गिर के संभलना कोई ,
हमर मन ले सीखे ।
छोड़ चल दिस सब संगी ,
संग कोनो नई दीखे ।।
गिर गेन जिहाँ पीके बेसुध ,
ऊहाँ रात बिता देथँन ।
होस बिहनिया आथे तब ,
धुर्रा झाड़त घर चल देथन।।
ले ले के उधारी पईसा ,
जम्मो पी के उडा़ देथन ।
चंगुल म सेठ सहुकार के ,
हम खुद ल फँसा लेथन।।
हमी मन तो देश के अर्थ
व्यवस्था के अधार आवन ।
कोई दे दे सहारा थोरकिन ,
लड़खडा़वत घर कईसे जावन।।
पाँच के लगईय्या हर ,
पच्चीस लग जाए ।
बिना पीये नई छोड़न ,
चाहे पुलिस लग जाए ।।
...........................................
व्याख्या :-
प्रस्तुत सम्पूर्ण कविता में रचनाकार हर व्यंग्यात्मक रुप से दारू पियईया के मनः स्थिति के मनोदशा के चित्रण करे के प्रयास करे हे अउ कईसे शराबी मनखे अपन आप ल देश के अर्थ व्यवस्था के आधार स्तंभ बताथे। जबकि पिये हालत म खुद रेंग नई सकै ।ये कर रचनाकार सर सरकार के ये बेवस्था पर व्यंग्य करे के प्रयास करे हे कि सरकार हर भट्ठी ल अपन आय के आधार मान के ऐला कभू बंद करे के प्रयास नई करे , शराब के पिये के आदत अपन साथ अउ कई सामाजिक बुराई ल पैदा करथे । ये व्यंग्यात्मक कविता के माध्यम ले मैं दारू के समाज के ऊपर पड़त बुरा असर ल उजागर करे के कोशिश करे हों ।।
No comments:
Post a Comment