जिला- रायगढ़ { छग }
शीर्षक- स्वर्ग बसे माँ के पाँव
विधा- छंद
{ कवित्त घनाक्षरी }
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माँ होती मंगलकारी , दुनिया की महतारी ,
ममता की मूर्ति प्यारी , माँ से ज्ञान पाइये ।
माँ ही जगती में लाती , गर्भधारी कहलाती ,
क्षीर पान करवाती , माँ का प्यार पाइये ।।
माँ सूखे में है सुलाती , गीले में वह सो जाती ,
हमेशा फर्ज निभाती , माँ से स्नेह पाइये ।
माँ भूखे ही रह जाती , कौर 'ठाकुर' खिलाती ,
ममत्व न दबा पाती , माँ का गुण गाइये ।।१।।
माँ रही संकटहारी , संतान को चाहे भारी ,
होती है धीरजधारी , माँ से सीख पाइये ।
माँ सेवा की अवतारी , है 'ठाकुर' सुखकारी ,
रखती समझदारी , माँ को न सताइये ।।
माँ का पाँव सुखदाता , पाप-ताप को मिटाता ,
बसे वहाँ स्वर्ग भ्राता , माँ पूजे से पाइये ।
माँ प्रथम गुरु होती , मन का है मैल धोती ,
चमकाती जैसे मोती , माँ से शिक्षा पाइये ।।२।।
माँ बनाती है संस्कारी , सुबुद्धि - विवेकधारी ,
सत्यव्रत - सदाचारी , माँ से यश पाइये ।
माँ हमेशा ध्यान देती , कष्ट को स्वीकार लेती ,
जीवन की नैया खेती , माँ को न रुलाइये ।।
माँ नहीं होती कुमाता , स्वार्थ से न रखे नाता ,
बलैया 'ठाकुर' जाता , माँ से मुक्ति पाइये ।
माँ से जो है बैर माना , नर्क में पाता ठीकाना ,
वेद-शास्त्रों ने बखाना , माँ का पद ध्याइये ।।३।।
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