Friday, May 15, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना

रचनाकार- जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
जिला- रायगढ़ { छग }
शीर्षक- स्वर्ग बसे माँ के पाँव
विधा- छंद


                 { कवित्त घनाक्षरी }
                     ०××××××०
माँ  होती  मंगलकारी , दुनिया  की   महतारी ,
ममता की मूर्ति प्यारी , माँ   से   ज्ञान   पाइये ।
माँ ही जगती में लाती , गर्भधारी     कहलाती ,
क्षीर   पान   करवाती , माँ  का  प्यार   पाइये ।।
माँ सूखे में  है सुलाती , गीले में वह सो जाती ,
हमेशा  फर्ज  निभाती , माँ  से   स्नेह   पाइये ।
माँ भूखे ही रह जाती , कौर 'ठाकुर' खिलाती ,
ममत्व  न  दबा  पाती , माँ  का  गुण   गाइये ।।१।।
माँ    रही   संकटहारी , संतान को चाहे भारी ,
होती   है   धीरजधारी , माँ  से   सीख  पाइये ।
माँ  सेवा की अवतारी , है 'ठाकुर'  सुखकारी , 
रखती       समझदारी , माँ  को  न   सताइये ।।
माँ का पाँव सुखदाता , पाप-ताप को मिटाता ,
बसे  वहाँ  स्वर्ग भ्राता , माँ   पूजे   से   पाइये ।
माँ   प्रथम  गुरु  होती , मन का है  मैल धोती ,
चमकाती  जैसे  मोती , माँ  से   शिक्षा  पाइये ।।२।।
माँ बनाती है संस्कारी , सुबुद्धि -  विवेकधारी ,
सत्यव्रत  -  सदाचारी , माँ    से   यश   पाइये ।
माँ हमेशा  ध्यान देती , कष्ट को स्वीकार लेती ,
जीवन की नैया खेती , माँ   को   न   रुलाइये ।।
माँ नहीं होती कुमाता , स्वार्थ से  न रखे नाता ,
बलैया  'ठाकुर' जाता , माँ   से  मुक्ति   पाइये ।
माँ से जो है बैर माना , नर्क में  पाता ठीकाना ,
वेद-शास्त्रों ने बखाना , माँ  का   पद  ध्याइये ।।३।।
                     ०×××××××०

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