जिला:- रायगढ़,छत्तीसगढ़
सृजन:-दिहाड़ी मजदूरों पर आधारित
शिर्षक:- मैं दिहाड़ी मजदुर हूँ
*मैं दिहाड़ी मजदूर हूँ*
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रोज कमाता रोज खाता,पेट पालने को मजबूर हूँ।
न रुकता न थकता कभी,निरन्तर बजता सन्तूर हूँ।।
कुरूपता में नूर लाता,करता सबको हूर हूँ।
मेहनतकश मजबूत मैं,एक दिहाड़ी मजदूर हूँ।।
पत्थर तोड़ लोहा बनाता,पारस बन कुंदन ।
खुशबू बन जग महकाता,घिसकर बन चन्दन।।
कोयले की कालिख से निकला,एक अनमोल कोहिनूर हूँ।
मेहनतकश मजबूत मैं,एक दिहाड़ी मजदूर हूँ।।
माटी बन कुम्हार का,हर मूरत को गढ़ता हूँ।
बंजर धरती चीरकर,हर रज को पढ़ता हूँ।।
देता सबको छप्पन भोग,जला हुआ तंदूर हूँ।
मेहनतकश मजबूत मैं,एक दिहाड़ी मजदूर हूँ।।
मुझपर नियत धरा की धुरी,जन जन की अभिलाषा हूँ।
विश्वकर्मा का मानस अक्स,परिश्रम कि परिभाषा हूँ।।
सबको देकर अनुपम सुख,हर सुविधा से दूर हूँ।
मेहनतकश मजबूत मैं,एक दिहाड़ी मजदूर हूँ।।
रूखी सुखी रोटी खाता,दो कपड़ों में दिन बिताता।
चुभते शिला पर चलकर,हर राह सुगम बनाता।।
नही कोई अस्तित्व मेरा,फिर भी मशहूर हुँ।
मेहनतकश मजबूत मैं,एक दिहाड़ी मजदूर हूं।।
अविराम मेहनत करता,हो गर्मी या बरसात।
कर्णप्रिय लगते हरदम,चाहे कितनी कड़वी हो बात।।
दर्द भी मुझसे दवा मांगती,कामगारों का गुरुर हुँ।
मेहनतकश मजबूत मैं, एक दिहाड़ी मजदूर हूँ।।
मौलिक रचना
अजय पटनायक
बहुत सुंदर रचना, भावुकता से परिपूर्ण......
ReplyDeleteबहुत सुंदर अजय भाई 🌹
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