राज्य - रुद्रप्रयाग उत्तराखंड
शीर्षक - नैतिकता की विरासत
नैतिकता की विरासत
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बचपन से सिखाई जाती नैतिकता
बापू कड़क लगते थे
शब्दों को तोल के बोलो
थोड़ा इधर उधर हुआ तो
'बोलने की तमीज सीखो'।
हां तो उठने बैठने चलने पर
जहां पर सब बैठे हो
बस ये आदेश निकलने वाला
'तमीज से बैठो'।
खाना खाने के बड़े नियम
घर में खाने की तमीज
मेहमान के रूप में तमीज
और शादी पार्टी में तमीज।
और भी बहुत तमीज
खेल, पढ़ाई, हंसी, मनोरंजन
हर कदम पर तमीज सिखाई
थोड़ा हास्य सा लगा पर
तब जा कर थोड़ा इंसान जैसा दिखता हूं।
आज एहसास होता वो सब
जब मै अपने बच्चों को
वहीं सिखाता हूं जो विरासत में मिला।
-संदीप सिंधवाल
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