2.राज्य -उत्तर प्रदेश
3.कविता का शीर्षक -वृक्षों का दर्द
4.मोबाइल नम्बर -7390993131
कौन खता की हमने,
जो काट रहे हो हमको!
कड़ -कड़ाती धूप में,
अपनी छाया में बिठाया था तुमको!!
अपने घर में कभी -कभी जब,
खाना नही बनाते थे!
सूखी-सूखी लाद लकड़ियाँ,
नित अपने घर को लाते थे!!
यदि समय से पहले हम वृक्षों को,
तुम काट-काट कर बेचोगे!
जीवन दायिनी प्राण वायु बिन,
जीवित कैसे रह पाओगे!!
पड़ा था सूखा जब धरा पर,
मानसून हमने बनाया था!
तड़प रहे थे जब नर पक्षीं,
पानी बरसा के उन्हें बचाया था!!
यदि काट डालोगे हम वृक्षों को,
पशु पक्षीं कहाँ को जायेंगे!
भूखे होगे जब तुम सब जन,
कंद मूल कहाँ से लाओगे!!
यदि कटोगे हम नित वृक्षों को,
आगे भूचाल बड़ा सा आयेगा!
आगे आने वाली पीढ़ी को तुम,
कदापि बचा नही पाओगे!!
अति सुंदर रचना। बधाई और शुभकामनाएं।
ReplyDeletebahut badhiya bhaiya ji
ReplyDeleteNice
ReplyDeleteBhut sunder bhai aur dher sari subhkamnaye
ReplyDeleteअति सुन्दर रचना हरीश भाई
ReplyDeleteअतिसुंदर bhai ji
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