Wednesday, April 8, 2020

उत्तराखण्ड से सुलोचना परमार की रचना- दिल के तार

नाम...सुलोचना परमार"उत्तरांचली"
पता.. देहरादून  (उत्तराखण्ड )
शीर्षक.. *दिल के तार*
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जब से हुई है मुहब्बत उनसे
दिल के तार स्वयं बजते हैं।
 कभी है पायल की रुनझुन तो
कभी अरमान मचलते हैं।

नयनों की चितवन से उनके
हम मन्द मन्द मुस्काये हैं।
रुख़सार पे लटकी जो  लट है
सौ सौ बल वो खाये  है ।

स्वप्न सलोने साथ सजें तो
*दिल के तार* स्वयं बजते हैं।

हैं आँखों से ओझल फिर भी
*दिल के तार* जुड़े रहते हैं।
कितने आंधी तूफ़ां आयें
 हम चट्टान बने रहते हैं ।

जब मन्द मन्द मुस्काये हम तो
*दिल के तार* स्वयं बजते हैं।

आओ प्यार का रूप सजाये
 शाहजहां मुमताज़ बन जाये ।
मर कर भी वो अमर है जैसे
हम भी ऐसा कुछ कर जाये ।

 तेरे मिलने की चाहत में
*दिल के तार* स्वयं बजते हैं।

क्या है मेरा क्या है तेरा
दुनिया आनी जानी है।
 गले लगा ले प्रियतम मेरे
जीवन बहता पानी है ।

प्यार भरे जज़्बातों संग तो
*दिल के तार* स्वयं बजते हैं।

 सुलोचना परमार
देहरादून    (उत्तराखण्ड )

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