उ.प्र.
कोविद विषाणु और हम
९४५४२०२९०५
पता नहीं कोविद विषाणु अपना कहर ढायेगी कब तक,
पता नहीं ये श्वांस भार पीड़ा का ढोयेगी कब तक,
पता नहीं ये आस मिलन की पिया से छोड़ेगी कब तक,
पता नहीं मधुमास बिखेरेगी मधु की मिठास कब तक,
पता नहीं ये प्यास तृप्ति का एहसास करायेगी कब तक,
पता नहीं उपहास की व्यथा हास संभालेगी कब तक,
मन में पीड़ा का भार लिये अश्रुओं को रोक रखें कब तक,
अब इनके वेग संभालें ना नैनों से इन्हें बह जाने दें।
इन दुविधाओं का अंत भला करने की मन में प्रण ठानें।
नि:सहाय निरुत्तर अंतस में आशा की किरण उजास भरे,
जो बीता उसको स्वीकृत कर पथ अगला अंगीकार करें।
प्राण अपने हथेलियों पर रखकर जो,
कर्त्तव्य पथ पर डटे हुये, आओ उनका उपकार करें,
नियमित स्वच्छ करें खुद को, संगरोध करें, संगरोध करें,
जो भी खोयेंगे कोविद से पाने का फिर संकल्प करें।
nice sir ji,pranam
ReplyDeleteधन्यवाद। शुभकामनाएं और आशीर्वाद।
Deleteबेहतरीन
ReplyDeleteधन्यवाद चेतना। एक छोटी सी कोशिश की है।
Deleteअति सुन्दर रचना🙏
ReplyDeleteधन्यवाद अंजु। इस भीषण महामारी के संदर्भ में लिखी रचना को सुंदर मानने का मन नहीं होता। मन की भावनाएं हैं बस। रचना में कुछ अशुद्धियां रह गयी हैं। जब अपने ब्लाग अपनी सोच अभिव्यक्ति अपनी पर इस लिंक को अपडेट करुंगा तो सुधार कर लूंगा।
Deleteसामयिक विषय पर समाज को जाग्रत करती बेहतरीन रचना।
ReplyDeleteधन्यवाद बंधु! हार्दिक शुभकामनाएं।
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