राज्य - छत्तीसगढ़
शीर्षक - अक्षय
अक्षय
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-- क्रोध तो क्षय होता है,
बैर भी क्षय होता है,
द्वेष क्षय होता है और,
आवेश क्षय होता है।
पर मेरे ऐ मीत सुन ये,
प्रेम क्षय होता नहीं,
हर पहर देखा इसे है,
सदा ही अक्षय होता है।
प्रेम वो गहना है जिसमे,
संसार सजता ही रहा,
खूबसूरत वह धरा पे,
सहज रमता ही रहा।
कौन जिसको यह न भाये,
यह बड़ा नम्र होता है,
सदा ही अक्षय होता है।
मानता हूं कष्ट मिलता,
राह इसके हर कहीं,
पथ है कांटो सा भरा,
दर्द सहता मौन सही ।
पर सफर ये पार करता,
कहां भयभीत होता है,
सदा ही अक्षय होता है।
आज विपरित इस घड़ी मे,
प्रेम का संदेश देवे,
जान ले हम मोल इसका,
और इक संकल्प लेवे।
यह सनातन सत्य है,
जीवन यही इक खेता है,
सदा ही अक्षय होता है।
-- संतोष श्रीवास्तव "सम"
कांकेर
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