Wednesday, April 1, 2020

चंडीगढ़ से शकुन्तला की रचना- आँगन

नाम-शकुन्तला
राज्य-चंडीगढ़
विषय-आँगन
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आँगन है वो खुली जगह
जो घर के पीछे होती है
जहाँ घर के सदस्य साथ बैठते
ये जगह घर की बड़ी प्यारी है।
मेरे घर के पीछे भी
इक बड़ा सा आँगन हुआ करता
जहाँ चारपाई इक बिछी हुई थी
जिसपर दादी माँ का डेरा था।
दादी माँ का डेरा???
सुनने में कैसा सा लगता है!!
पर सच में ही उस चारपाई पर
दादी का संसार बसता था।
इक तरफ वो रखती अपनी चादर
दूजी तरफ ऐनक रहती
उसी पे बैठ मेरी दादी माँ
सारा दिन थी स्वेटर बुनती।
मेरे घर के आंगन में
इक नीम का बड़ा सा पेड़ भी था
उस पेड़ के नीचे माँ को मैंने
पापड़ सुखाते देखा था।
माँ पापड़ की थाली रखकर 
उसको जाली से ढक देती थी
फिर उस जाली के ऊपर
भारी पत्थर रख देती थी।
उस पेड़ की शाखों पर न जाने
कितने पक्षी बैठते थे
हम आँगन में उन सब के लिए
पानी और चावल रखते थे।
कहते हैं घर के आंगन में 
गौरैये का आना शुभ होता
उनका आना, दाना चुगना
परिवार का मंगल कर जाता।
पर उन चिड़ियों के ऊपर 
माँ को झल्लाते देखा कई बार
वो आँगन में तिनके बिखरा देती
माँ उन्हें बुहारती थी बार-बार।
मेरे घर के आंगन में
धान सुखाया जाता था।
वहाँ बार-बार चिड़ियों का आना
मन को बहुत ही भाता था।
मेरे घर के आँगन में
तेज़ धूप आती थी।
सर्दियों में माँ वहीं हमे
खाना परोस के देती थी।
आँगन के इक कोने में
आचार के बोतल रहते थे
जल्दी ताकि पक जाएं वो
धूप में रक्खे जाते थे।
दोपहर को जब कभी-कभी
माँ, दादी सो जाते थे
हम चुपके-चुपके आँगन में आकर
अचार चुराकर खाते थे।
सांझ का धुंधलका जैसे पड़ता
आँगन ठंडा हो जाता था।
सुबह का सारा रौनक मेला
झट से मानो थम जाता था।
तब तो आँगन में फिर धीरे से
इक बिल्ली आ जाती थी,
मैं छिपकर उसको दूध दे आती
माँ देख बहुत घबराती थी।
कहती थी माँ- "सुन बिटिया!
आँगन में अकेले मत जाना,
रात को पेड़ पे भूत होते हैं,
पेड़ के नीचे मत चले जाना।"
सुनकर माँ की बात भागकर
घर में घुस जाती थी
कमरे में कर बन्द दरवाज़ा
डरकर सो जाती थी।
आज बैठकर सोचती हूँ तो
घर बहुत याद आता है
माँ, दादी और आँगन मेरा
सपना सा लगता है।
अब तो ऐसा समय आ गया,
घर भी सिमट कर रह गए 
अब कहाँ रहे वो आँगन घर के
अब तो फ्लैट में बंधकर रह गए।

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