शीर्षक:-कर्म का दीप
राज्य:- छत्तीसगढ़
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~ •°• *कर्म का दीप* •°• ~
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कर्म का दीप
जलाता चल राही,
श्रम सीकर का घृत बन
जलता चल राही।
फल की इच्छा
कभी ना करना,
हँसी-खुशी निस्वार्थ
भाव से पग आगे धरना।
क्षणभंगुर काया है,
इसका शोक क्या करना,
श्रम कर कुछ ऐसा,
इतिहास बनाता चल राही।
जल-थल,गिरि,सागर,
तरणि में कर्मक्षेत्र बनाता चल।
स्वेद कण को
मोती से चमकाता चल,
मेहनत से आगे बढ़,
नव विहान लाता चल राही।
हर पल तपता, प्रखर
प्रबुद्ध बनता चल,
जीवन कठिन है ,लेकिन
बिन परवाह बढ़ता चल।
तिमिर चाहे हो गहरा,
कर्म- दीप जलाता चल,
संघर्षों के बल पर अपने को
खास बनाता चल राही।
आँधी आए या तूफाँ,
सब गुजर जाएगा,
विश्वास के बल पर,
पर्वत झुक जाएगा।
एक दिन संघर्ष का
बादल छट जाएगा।
कर्म से प्रेरणा का
एहसास दिलाता चल राही।
कर्म का दीप
जलाता चल राही,
श्रम सीकर का घृत बन
जलता चल राही।
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नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर( छ. ग.)
Ek number.
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