राज्य - राजस्थान
कविता का शीर्षक - कोरोना नहीं कर्मा!
कविता:-
प्रकृति ने क्या खूब इंसान का घमंड तोड़ा है,
समझता था गुलाम जिस प्रकृति को,
आज उसी ने उसका मुंह तोड़ा है,
करता फिरता था पक्षियों को जों पिंजरों में कैद ,
आज खुद ही पड़ा है कारागार में कैद ,
आजाद है आज पंछी आसमान में,
बंधा हुआ बैठा है इंसान अपने ही जंजाल में,
ये ही प्रकृति का नियम है,
यही न्यूटन का तीसरा गतिनियम है,
संभल जा अब भी ए इंसान वरना,
ये तो विनाश कि सिर्फ शुरुआत है,
आपदा नहीं ,सिर्फ कर्मो का परिणाम है।।
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