केरल
शीर्षक : एक जुड इंजान, कहीं भी हारा नहीं
एकजुड इंजान,कही भी हारा नहीं
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एकजुड़ रहे अब हम
एक साथ चलें हम
अब ना एक देश है, ना कोई घर्म है
ना कोई भाषा है, ना एक संस्कृति
ना देश है न परदेश भी
बस हो गये हैं हम एक
उस भयंकर शत्रु से၊
आज सातों भूखंड एक साथ
होकर धरती सा देश बन चुका है।
कितना अच्छा सा संदेश है यह
घर्म जाती देश भाषा सभ्यता से परे
मानव सी जाती, संवेदना सा धर्म၊
ताकतवर है सदा मनुष्य
पक्का उनका इरादा भी इसलिए
सदियों से वो धरती से और स्वयं लडते रहते,और
लगातार अपना अस्तित्व भी बरकरार रखते၊
आज अब वो दुशमन मामूली सा नहीं
सारे धरती को वो अपने चंगुल में
फँसाना चाहता है,
वो कोई असुर नहीं अन्य ग्रह का जीव नहीं
बल्की एक वायरास ही है और कोरोणा
उस भक्षक का नाम भी।
हाथ पसारे पूरे विश्व को अपनी बाहों पे लाकर
निगलने में तुले है, वो भयंकर विनाशकारी है၊
उसका नाम कारोणा वइरस है ၊၊
न झुकने देंगे हम,अपनी मानवता को
न मिटने देंगे,अपनी इंसानियत को और
एक साथ लडना हम जानते है
तरीका निकालना हम जानते है
सावधानी से हम लडकर जीत हाजिल कर देंगे
सुन लें ऐ कोरोणा!तू किसी से लड रहा है
ज़रा कभी सोच लेना
ईश्वर की उस उदात्त सृष्टि से जो भगवान ने अपनी पूरी ताकत देकर जिनके सृजन थे और
वो कोई नहीं हम मनुष्य हैं
हमें हराना कभी संभव नहीं सभी घाराएँ हम पर है
बहाते तुझे हम दफ़ देंगे तुम्हारा कब्र सजाएँगे
सदा के लिए तुझे हम सुलायेंगे।
एक जुड इंजान कही भी हारा नहीं ॥
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