राज्य-राजस्थान
शीर्षक कविता-जब नहीं होंगे आप
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जब नहीं होंगे आप
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बुढाते तलवों की
सिलवटें सहलाते रहे छुपाकर
सारा दर्द,
सिर्फ
हमारी खुशियों को अंवेरते।
घने जंगलों के कंटीले रास्ते
जारी रखा सफर अनवरत
हमारे सुख सपनों की गठरियां
अपने सिर धरे अनथक
पसीना पोंछ पोंछ।
चले जाते खेत अलसुबह
बिना किसी शिकायत
और आते आधी रात
बिना आहट कि
नींद ना बिडरे हम छौनों की।
हमारे फूलने फलने
आगे बढ़ने के झेले झूलते
भुलाए रखी अपनी सारी भूख।
गिनती करते रहे
अपनी अंगुलियों की पोर
बीते/आते
चौमासों की विगत
मन की रीती गठरी को निहार।
पीङा पूरी आंखों में समेट,
बिल्कुल उमटेगी यादों की
अकूत आंंधियां कलेजे के
चारों कोनों
जब नहीं होंगे आप।
पिताजी के नहीं रहने की स्थिति के दर्द की अभिव्यति--
मौलिक व स्व रचित।
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