शीर्षक - गांव जाने दो साहब
राज्य - रुद्रप्रयाग उत्तराखंड
गांव जाने दो साहब
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खाने के लाले पड़े है
पैरों में छाले पड़े हैं
गांव जाने दो साहब
घरों में जाले पड़े हैं।
गांव जाने दो साहब
कुछ खाने दो साहब।।
यहां मैं बेजान पड़ा हूं
खौफ को जान पड़ा हूं
इधर कोई नहीं है मेरा
शहर के शमशान पड़ा हूं।
गांव जाने दो साहब
मिल जाने दो साहब।।
थोड़ी जिंदगी दे दो साहब
घर की बंदगी दे दो साहब
अपनी मिट्टी में मर जाऊं
मुझे मेरी जमीं दे दो साहब।
गांव जाने दो साहब
मर जाने दो साहब।।
संदीप सिंधवाल
रुद्रप्रयाग उत्तराखंड
Superb
ReplyDeleteमार्मिक अभिव्यक्ति
ReplyDeleteVery good bhai ji
ReplyDeleteNice
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