महाराष्ट्र
"शुरुआत भ्रष्टाचार की"
गुमराहों की दुनिया का एक राही
लिए कागज़, कलम, स्याही
एक छोटी सी टपरी चाय की
एक छोटी सी झोपडी मुकाम की
बुढ़े बाप की रोजी कमाई
खाने वाले छह-सात भाई
ऐसे में बी.ए. की डिग्री
फिर भी उसे न मिली नौकरी
क्या करता न पैसा है
क्या कहता न सिफारिश है
घूमता है लंबा-चौड़ा बदन लिए
सोचता है पुलिस भर्ती में जाए
लेकिन...
वहां छाती टेप से नहीं
पैसों से नापी जाती हैं
हिम्मत कार्य से नहीं
घूंस से जांची जाती है
फिर भी उमंगे हैं, है वहीं सपने
सोचता है इस दुनिया में कोई नहीं अपने
लेकिन, उसका ये मानना गलत था
उसके बाप का भी यही सपना था
झोपड़ी का छोटा प्लॉट बचा था
जिसके लिए खरिददार ढूंढ रहा था
यह सुन, बेटे का मन द्विधा से भर आया
अपने सोचें पर उसे रोना आया
दिल में प्यार था बाप के प्रती
तो जमाने से दिल में नफ़रत भरी थी
फिर, वही सोचने लगा अक्ल की बात
पुलिस बनने के बाद जमाने से होगी मुलाकात
जितना बाप ने दिया है
उससे दुगुना प्यार दुंगा
जितना जमाने ने लिया है
उससे दुगुना दाम लुंगा
इसलिए,
शुरुआत जड़ों से होती है
पत्तों से नहीं
ये दुनिया जाने वालों से बस्ती है
आने वालों से नहीं
- यश
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