सम्पर्क - 9098518976
पता - पेंडरवानी , बालोद , छ .ग.
शीर्षक - अनंत विलीन
" अनंत विलीन "
–––––––––––––––
नील गगन , नीलाम्बर पर ,
कलरव की मीठी साज घोल ,
उड़ते क्षितिज पार है ,
अपने परवाज खोल ,
हेमकिरण से चोंच लड़ाते ,
फ़ुर्र - फ़ुर्र करते आते -जाते ,
उड़ते परिंदे मस्त चमन ,
शांत चित्त , उन्मुक्त गगन ,
बंधे -बंधे है जन संसार ,
खुले -खुले अम्बर विस्तार ,
मन दौड़े पाने विस्तार ,
पर नही उसका पारावार ,
मृदुल पवन लिए बाहों में प्रीत अपार ,
रह -रह आंधी का प्रहार ,
जिनके आगे नतमस्तक संसार ,
पर अनंत विलय कर लेता उनको ,
लेकर अपने बाहु पार ,
प्रकृति माता का नीला आँचल सा ,
हरी दरी वन -उपवन मखमल सा ,
ईश्वर ने रचा अनुपम स्वरूप ,
सुख -दुख सा छांव -धूप ,
अंत काल हो जब सामर्थ्य हीन ,
तब अनंत करें , अनंत विलीन ,
- शैलेन्द्र चेलक -
बहुत सुंदर रचना भाई साहब
ReplyDeleteआपकी रचना हमेशा लाजवाब रहती है सर जी
ReplyDeleteधन्यवाद आदरणीय जन
ReplyDelete