राज्य---उत्तर प्रदेश
कविता का शीर्षक ---- एक शिखण्डी चाहिए
नव गीत --एक शिखण्डी चाहिए
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आज जीने के लिए
एक शिखण्डी चाहिए ।।
औंधे मुँह है रूढ़ियाँ
धूल भरी है आँख
चिकना खीरा रो रहा
भीतर धारे फाँक
एक नव संधान को
बस रणचंडी चाहिए ।।
फटा हुआ ईमान है
तार तार है नीति
डुबकी सभी लगा रहे
उजली कहते रीत
सर्वसिद्ध साधने को
एक घमंडी चाहिए ।।
फैल रहा है हर तरफ
वैमनस्य का रोग
नाच रही विषमता
रोता मन का योग
नए नए विस्फोट को
शिव प्रलयंकर चाहिए ।।
बन्दूकी आग डर रही
उछले पत्थर कंकर
भूख करे गंधर्वगान
नोट भरे मुँह शंकर
आत्म रक्षा के लिए
एक बन्दी चाहिए ।।
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