रायपुर, छत्तीसगढ़
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कृष्णा की पुकार... कब तक...
मन जरा भारी सा है....जरा या मन मन भारी है
आज एक कविता सुनी... व्यास झूठ बोलता है...
महाभारत की पृष्ट भूमि थी, दृश्य दरबार मे थमी थी
कृष्णा की थी कृष्ण पुकार, मचा हुआ था हाहाकार
राज सभा मे बैठे गुणी जन, पर छाया था अंधकार
अनसुनी रह गई गुहार, बोल रहा था अहंकार
मौन रह गए सभागार, हो रही थी अस्मिता तार तार
सोच रहीं बड़ी देर से, क्य़ा फर्क़ आया है तब से
हर राह पर आज भी कृष्णा, होती बेबस और लाचार
तमाशबीन बैठा जग सारा, मूक बने हैं पालनहार
न्याय व्यवस्था शिथिल पड़ती, सारे क़वायद हुए बेकार
कब तक बैठेगी कृष्णा, करती सब से मनुहार
कब तक कृष्णा करे पुकार ले कर औरों से स्वर उधार
उठना होगा स्वयं उसे ले कर हाथों में तलवार
होता है तो होने दो महाभारत सा नरसंहार...
रश्मि...
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