Monday, March 30, 2020

महाराष्ट्र से संजय वासनिक “ वासु” की रचना- करो_ना

नाम- संजय वासनिक “ वासु”
शीर्षक-* करो_ना *
राज्य- मुंबई , महाराष्ट्र 
सम्पर्कः- 9869081484

*करो_ना *

ज़िंदगी अब रेल के 
सफ़र सी हो गयी है। 
खुदका घर ही  रेल की 
बोगीसी बन गयी है ।
हर परिवार कुपे  का 
यात्री बन गया है ।
किचन पैंट्री बन गयी 
सोफ़ा और बेड बर्थ हो गये ।
खाना, सोना और बातें करना ही 
एक काम बन गया है ।
सफ़र तो कई साथ साथ कर रहे है
कोई भी किसीका हमसफ़र  नही । 
एक दुजे को सब जानते तो है 
पर शायद कोई पहचानता नही ।
यह सफ़र कितना लंबा है 
कोई जानता नही ।
इसका मक़ाम कहा हो
किसीको पता ही नही ।
खिड़कियों के बाहर झांकें 
तो मंज़र विराना नज़र आता है। 
पेड़ पशु पक्षी  फ़सले सब 
व्यस्त और मस्त नज़र आते है । 
बस इंसान ही ना जाने 
कहाँ ग़ायब हो गया है ।
चलती हुयी रेलसे देखो तो 
सबकुछ तो चल रहा है । 
ना जाने क्यों यकायक 
ज़िंदगी ही अचल हो गयी है ।
किसकी देन है या कोई श्राप 
कैसी  है ये अजिब सी बेचैनी ।
या कोई  आंतक  है फैला हुआ 
या कायनाती आपदा ...
या है कोई बीमारी फैल गयी । 
ऐसे में मेरी भी एक है सलाह! 
कुछ भी करे कोई 
या करे आवारागर्दी !
जिसे उसकी नही परवाह !
पर तुम यह सब कुछ ना करोना ! 
इसी आफ़त का नाम ही है करोना ! 
किंतु इससे इतना भी डरोना !
अपने कुपेसे बाहर निकलो ना! 
रखो सफ़ाई का ध्यान, 
बनाये रखो आपस में दुरियाँ ! 
यही है इस आफ़तकी कमजोरीयॉ !
तब ना होगी ये हावी किसी पर 
एक दिन  फिरसे जियेंगे ख़ुश हो कर ! 
#संजय वासनिक “ वासु”

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