Saturday, March 28, 2020

बिहार से कंचन प्रभा की रचना- मैं एक राज बनूँ

नाम- कंचन प्रभा 
राज्य- दरभंगा , बिहार
शीर्षक- मैं एक राज बनूँ

 मैं एक राज बनूँ 

तेज आँधी जब चले
मैं रुख तो नही बदल सकती
बस किसी पँछी की तरह
मैं परिंदो की परवाज बनूँ

पर काटने वाले भी
लाखों मिल जायेंगे हर मोड़ पर 
बस कल की नई सुबह के लिये
किसी पपीहे की आवाज बनूँ

मेरी आवाज को दबा कर
सैकड़ो आगे बढेंगे राहों में 
बस उनलोगों की सोच केलिये
मैं एक सुन्दर साज बनूँ

बैठे है कितने कितने सायर
करने को जग की तारीफ
मैं अपनी ही कविता में छुपकर
खुद अपनी ही अंदाज बनूँ

चलते चलते मंजिल तक मैं 
पर्वत के उस पार बढूं
तिरंगे की उस तीन रंग में 
मैं  भी चक्र सा ताज बनूँ

जलते जलते शबनम की बुंदे
गिरने लगे जब धरती पर 
उससे जो लोग रौशन हुये
उन सबके लिये मैं नाज बनूँ

बात अगर बुझने की आये
सांस छुपा लूँ सीने में 
मन के किसी कोने में फिर
मैं खुद के लिये एक राज बनूँ

कंचन प्रभा 
दरभंगा , बिहार

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