शीर्षक- साड़ी
राज्य-छत्तीसगढ़
एक सुबह पत्नी जी बोली पति से करते हुए ठिठोली
पास की सेल से साड़ी ला दो,भर दो प्रियवर मेरी झोली
बेबस पति घबराया,जेब की सिकुड़न देख शरमाया
हाथ जोड़ विनती की उसने
मत देखो देवी ये सपने, नयी साड़ी में क्या रखा है?
कभी पुरानी चीज़ों का स्वाद चखा है?
ये दुनिया ओल्ड इज़ गोल्ड का सिद्धांत जानती है
तभी तो पुरानी चीज़ों का महत्व पहचानती है
पत्नी क्रोधयुक्त स्वर में चिल्लाई
नहीं चाहिए मुझे तुम्हारे शब्दों की हवा हवाई
अगर मैंने नाराज़ होकर पकड़ा रास्ता मैके का
फिर किससे करवाओगे तुम अपना काम चौके का
मेरे जाने के ग़म में तुम रोओगे पछताओगे
मेरे परवाह न करने पर, देवदास के सुर में गाओगे
पति पर इस चेतावनी ने कई लीटर अमृत बरसाया
पत्नी की ये बात सुन मन ही मन हरषाया
चहकते हुए उसने कहा खुशी से तुम रहना वहां
मैं तुम्हारी हर फरमाइश पूरी कर दूंगा
सिर्फ़ साड़ी ही नहीं, पूरी सेल तुम्हारे नाम कर दूंगा
अगर तुम केवल एक वादा निभाओगी
आज की गाड़ी से जाओगी,लौटकर फिर नहीं आओगी
पत्नी रोकर बोली हे नाथ!
क्या छोड़ दोगे तुम मेरा साथ
कल तक मैं गले का हार थी,क्या आज मैं रास्ते का धूल हो गई?
पति हंसकर बोला अरे नहीं पगली
बरसों पहले मांगी थी इक दुआ,
वही आज क़बूल हो गई।
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